कार्यसिद्धी की विधी
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।।
(श्रीमत् भगवद्गीता : १८.१४)
☘️☘️☘️
हिंदी भावानुवाद -
माध्यम से भी अधिक महत्व रखता है उद्देश..
धर्माधिष्ठान की नीव पर हो कर्म नित्य विशेष...
कर्ता का भी सुयोग्य होना है मात्र अनिवार्य ...
उचीत कर्ता विना सफल न हो पाएगा कार्य ..
समर्थ कर्ता के हाथों में उपकरण हो उपयुक्त ..
उपकरणों का उपयोग हो श्रेष्ठ प्रणालीयुक्त ...
चारों कारकों के होने से जो किए है निर्दिष्ट ...
कार्यसिद्धी की निश्चिति होगी, जब दैव हो इष्ट..
दैव के उपर निर्भर रहना है बस जिनका स्वभाव ...
क्रम पालन नच करने से, सिद्धी का होगा अभाव..!
~ भावानुवाद - पंकज. 🪷
(२९.०१.२३ )

.jpeg)
Comments
Post a Comment