आज अगर सावरकर होते .!
*आज अगर सावरकर होते ..🌻🍃*
आज अगर सावरकर होते ...
तो क्या मौन रहते ?
हसते.. या रोते ?
देख कर आज की परिस्थिती
तथा समाज के मन की स्थिती
शिक्षा के मंदिर में जाकर
पुस्तक में मिथ्या इतिहास पाकर ..
युवाओं की स्थिती देखकर ..
क्या वह विषण्ण होते ?
आज अगर सावरकर होते..! ---१
भाषा की यह स्थिती देखकर..
शब्दों की वर्तनी देखकर..
भाषाशुद्धि के गवाक्ष से ...
देश प्रेम की गति देखकर..
क्या वह मौन रह पाते ?
आज अगर सावरकर होते..! -- २
जात्युच्छेदन के आड़ से,
समाज मे होते कृत्य देखकर ..
मिथ्या तत्वों के आधार पर..
समाज का विभाजन देखकर..
क्या वह हतोत्साहित होते ?
आज अगर सावरकर होते..! -- ३
लोकतंत्र के मंदिर में जब..
लोकप्रतिनिधी ही षड्यंत्र करे तब..
देश का हित और कल्याण छोड़कर..
भ्रष्टता का अंगिकार देखकर..
क्या वह विफलता का अनुभव करते ?
आज अगर सावरकर होते..! -- ४
अभ्युदय तथा निःश्रेयस का..
संतुलन प्राण है जिस संस्कृति का..
वहीं दिखे जब समतोल बिगड़ता..
समाज में जब दिखें उदासीनता..
तब क्या वह अंतरमुख होते ?
आज अगर सावरकर होते..! -- ५
राष्ट्र, जहां पर शास्त्र के पास में,
शस्त्र की भी पूजा होती थी..
क्षात्रतेज के समर्थ प्रकाश में..
धर्म की भी धारणा होती थी ..
आज धर्म को ग्लानि में देख..
क्या वह प्रक्षोभित होते ?
आज अगर सावरकर होते..! -- ६
( क्या वास्तव में, आज अगर सावरकर होते, तो दिन ऐसे ही होते ? समाज ऐसा ही होता ? हमारा राष्ट्र ऐसा ही होता ? यही विचार आगे की पंक्तियों मे चित्रित करने का प्रयत्न है ! )
आज अगर सावरकर होते..
तो भारत हिंदुराष्ट्र होता..
सभी विचार और पंथों को वह,
समन्वय से अपने में समाता..! -- ७
आज अगर सावरकर होते..
तो हर पतित पावन बनता..
हृदय की समग्र पतितता को..
समूल वह निकाल पाता..! – ८
आज अगर सावरकर होते..
तो संविधान कदाचित् भिन्न होता..
लोकतंत्र के ही प्रारूप में रहकर..
समाज अधिक निरामय होता..! -- ९
आज अगर सावरकर होते
तो संपूर्ण कश्मीर अखंड होता..
जिस की निष्ठा विदेश में रहे..
वह भारत का नागरिक न होता..! --१०
आज अगर सावरकर होते..
तो संस्कृत शिक्षण सुलभ होता..
संस्कृतोद्भव शब्दों का सभी से
मातृभाषाओं में भी चयन होता..! -- ११
आज अगर सावरकर होते..
तो शिक्षण निश्चित सुसंस्कृत होता..
आधुनिक शिक्षा के साथ में..
तन, मन का स्वास्थ्य प्रधान होता..! -- १२
आज अगर सावरकर होते..
तो देश संगठित, सशक्त होता ..
राष्ट्रद्रोह के अक्षम्य अपराध को..
समाज ही कभी न पचने देता...! -- १३
आज अगर सावरकर होते..
तो घर-घर में माता विदुला होती..
सुंदरता की व्याख्या तो..
सामर्थ्य के बिना अधुरी होती..! -- १४
आज अगर सावरकर होते..
तो शुद्धिकार्य हर हिंदू करता..
इतिहास में जो क्षति हुई है..
सब्याज उसकी परिपुर्ती करता..! -- १५
सावरकर क्या आज हमारे,
साथ नही यह सत्य है ?
देह तो बस एक माध्यम है..
और विचार क्या न चिरंतन है ? -- १६
आज क्षितिज पर अरुणिमा की रेखा
निश्चितही उन्होंने देखी होगी..
देख, आशान्वित और हर्षित हो,
सूर्योदय कि उन्हें भी प्रतिती होगी..! -- १७
भारत के क्षितिज से उठती..
किरणों की आभा यह दिखाती है
अंधकार मिटाकर, सूर्य का उदय..
विधि का विधान बताती है..! -- १८
सावरकर की अंतरात्मा की,
आवाज अगर हम सुन पाते..
आशीष प्रदान कर वह हमसे कहते..
"मैं अनादि, अनंत विचार हूँ
और, विचार कभी नही मरते !!!” -- १९
शब्दसेवा ~ पंकज नेरूरकर 🪷
सादरीकरण - कुमार निरंजन नेरूरकर
https://youtu.be/xBDe1lOxbq4


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