हे अंबर !!
नमो वः ।
_( आज़ 'आकाश' इस विषय पर एक कविता लिखने का आदेश आत्मज चि. निरञ्जन से प्राप्त हुआ । (😍) कल पाठशाला में उसे यह कविता कंठस्थ कर, सुनानी है । आज्ञा के पालन हेतु, अल्प प्रयत्न सबके साथ साझा कर रहा हूँ । 'आकाश' के अधिकतर समानार्थी तथा संस्कृतोद्भव शब्दों का उपयोग करने की चेष्टा की है । अभिप्राय, सुझाव अवश्य दे । 🙏🏽 )_
' हे अंबर !' ☄️🪐🌞
हे अंबर ! कहां उगम है तेरा, और कहा तेरा है अंत ?
अगणित तारामंडल तुझमे कैसे समाएँ है, हे दिगंत ?
ऐसे सबको पकडे रखना, हे व्योम ! कैसे तुम करते हो ?
इतनी सारी आकाशगंगाएँ, तुम कैसे बाहों में धरते हो ?
हे नभ ! तू एक माता है जो, हर बच्चें का करें दुलार !
कहीं तू लाएँ बादल, पानी, कहीं पर हीरों की बौछार !
हे गगन ! मैने है देखा, तुमको अपनें में मगन सदा !
हे अंतरिक्ष , तुम कब सोते हो, पाते हो विश्राम कदा ?
हे आकाश , तू अगर न होता, निश्चल, तठस्थ, स्थिर सदा
अलिप्त कैसे रहते हो भला, हो कर इतनी धन-संपदा !
~ पङ्कज 🪷
( ०८.१०.२३ )


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